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ललक की दिल्ली यात्रा

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बिहारियों की ललक दिल्ली पहुंची। पहले संदेह था-मालिक (प्रधानमंत्री) मिलेंगे कि नहीं? उनको फुर्सत है या नहीं? खैर, मालिक मिले। अब संदेह है-मालिक मानेंगे? ललक पूरी करेंगे? ऐसे ढेर सारे सवाल हैं। बिहार, यहां के लोग दशकों से इन सवालों का जवाब तलाश रहे हैं। जदयू की हस्ताक्षर ज्ञापन यात्रा को देखते हुए एकसाथ कई बातें याद आयीं। एकबारगी पूरा इतिहास आंखों के सामने घूम जाता है। याद आती है अंग्रेजों की वह समझ, कारनामा जिसने आजादी की लड़ाई में सिर उठाने वाले इलाकों को बुरी तरह कुचला था। और यह तो साफ-साफ दिखता है कि कैसे आजादी के बाद बिहार को आंतरिक उपनिवेश बनाकर रखा गया? इस पृष्ठभूमि में दिल्ली पहुंचा काफिले ने नई उम्मीद तो दी है मगर कई तरह के संदेह भी रखे हुए है। दरअसल, बिहार को कभी ठीक से सुना नहीं गया। उसकी पीड़ा जानी ही नहीं गयी। इसके लिए इस माटी की वे संतानें ज्यादा जिम्मेदार रहीं हैं, जो इसकी बेबसी को दूर करने की हैसियत रखती रहीं हैं। 1935 में उड़ीसा से अलग होते वक्त भी बिहार पंजाब, बंबई, बंगाल जैसे कई राज्यों से काफी गरीब था। फिर उसे झारखंड का शोषक होने का आरोपी बता बांट दिया गया। हालिया राज्य विभाजन के समय झारखंड की प्रति व्यक्ति आमदनी 1544 रुपये थी और बिहार की मात्र 901 रुपये। उस दौरान सबने मालिक (दिल्ली) के सामने अपना-अपना पैकेज पेश किया था। राज्य सरकार का पैकेज एक लाख नवासी हजार करोड़ रुपये का था। नहीं मिला। क्यों नहीं मिला? कौन जिम्मेदार है? अब जदयू की रथ पर सवा करोड़ हस्ताक्षर गया है। मगर, फिर वही सवाल-बिहारियों का अरमान पूरा होगा? बिहार के प्रति मालिक की समझ इस प्रसंग से समझी जा सकती है। एक अप्रैल 1936 को बिहार, उड़ीसा से अलग हो स्वतंत्र अस्तित्व में आया था। 1935 के दौरान बिहार-उड़ीसा ने प्रतिटन कोयले पर 25 पैसे की रायल्टी मालिक (केंद्र) से मांगी थी। मालिक ने इंकार कर दिया। शुरू से ही यहां के खनिजों का मालिक दिल्ली रही। खनिज बिहार के और कारखाने लगते रहे दूसरे राज्यों में। बिहार की कंगाली की कीमत पर दूसरे राज्य अमीर होते गये। भाड़ा समानीकरण की नीति ने तो यहां की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह बर्बाद कर दिया। दक्षिण बिहार (अब झारखंड) के क्षेत्रों में आधारभूत संरचना व उद्योगों की स्थापना के रूप में 24 हजार करोड़ रुपये के निवेश हुए लेकिन विभाजन के बाद बिहार के हिस्से क्या आया? आईडीपीएल, चर्म उद्योग, जूट मिलें, बरौनी खाद कारखाना, चीनी मिल …, कहीं कोई चालू उद्योग दिखता है? ऐसे नमूनों की कमी नहीं है। यह दूसरा सीन है। हाजीपुर रेलवे जोनल कार्यालय के मसले पर बिहार की कामयाबी ने पहली बार यह साबित किया कि वाकई अगर राज्य हित को ले एकजुटता दिखायी जाये तो उसके कितने सकारात्मक परिणाम निकल सकते हैं! लेकिन बाद के दिनों में राजनीति अपने सतही स्वरूप में ही क्यों आ गयी? यहां तो धान-गेहूं खरीद से लेकर बाढ़-सूखा राहत तक पर राजनीति हो जाती है। क्या भूखे-नंगों को भी जाति-संप्रदाय में बांटा जा सकता है? क्या बिहार किसी एक व्यक्ति का है या फिर आरोप-प्रत्यारोप से इतर राजनीति के कोई मतलब है कि नहीं? आखिर आदर्श व्यवस्था के जिम्मेदार इस बात को कब समझेंगे कि जो राज्य हरेक साल बाढ़ में तबाह हो जाता है, जहां के किसानों को अपनी उपज का वास्तविक मूल्य नहीं मिल पाने के कारण खेती से दूर होने का दौर है, वह समृद्ध कैसे हो सकता है? अब तो यह तय कर पाना मुश्किल है कि दो सरकारें भिड़ीं रही हैं कि विरोधी राजनीतिज्ञ? केंद्र-राज्य के अपने-अपने पैसे हो गये हैं। जनता कहीं रही? बिहार, रूटीन मसलों में भी भयावह उपेक्षा का पर्याय है। इधर के ही उदाहरणों को देखें, तो सूखा पीडि़तों के लिए सहायता पैकेज, कोसी पुनर्वास पैकेज, एनएच पर राज्य योजना से खर्च 970 करोड़ रुपये की वापसी …, जैसे मसले सब कुछ कह देते हैं। राज्य सरकार ने अपने स्तर से चीनी मिलों के दोबारा खुलने की आस जगायी, तो मालिक का सुगरकेन कंट्रोल आर्डर इसके रास्ते में आ गया। फिर चाहे बीपीएल परिवार हों, बिजली परियोजनाओं के लिए कोल लिंकेज, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, नेपाल में सप्तकोसी एवं सन कोसी योजना …, कभी-कभी तो यह भ्रम होता है कि बिहार, भारत का अंग नहीं है? और शायद यही वजह है कि बिहार के लोग लद्दाख में सड़क बनाते मिल जाते हैं, तो कोलकाता में रिक्सा खिंचते भी। दिल्ली के लिए बिहारी सिण्ड्रोम होता है तो मुंबई से राज ठाकरे उन्हें भगाने का अभियान चलाने का ऐलान करते हैं। एक और बड़ी बात है। बिहार के इस सम्मान की बरकरारी के लिए कभी पार्टियों में बिहारीपन का भाव जगा क्या? उनके बीच एकजुटता हुई? नहीं, तो फिर उन्हें यहां की राजनीति करने का क्या अधिकार है? अगर यहां के लोग बिहारी न होकर राजपूत, भूमिहार, ब्राह्मïण, यादव, कोयरी-कुर्मी हैं, तो क्या यह पार्टियों के समेकित कारनामे का नतीजा नहीं है? राज्य को भी कुछ चीजें अपने स्तर से करनी पड़ेंगी। जमुई के मंजोश गांव में कोयले की गुंजाइश देखनी चाहिये। बांका जिले के कटोरिया प्रखंड में जमीन के नीचे गैलेना (शीशा-रांगा) पड़ा हुआ है। गंगा के तटवर्ती क्षेत्रों में पेट्रोलियम पदार्थ हैं। जमुई, भागलपुर, बांका, गया, जहानाबाद आदि जिलों में ग्रेनाइट है। बहरहाल, सबसे बड़ी बात यह है कि अब बिहार रा मैटेरियल नहीं रहना चाहता है। वह लंबी छलांग के लिए अकुला रहा है और इसमें जो भी बाधक बनेगा …?

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

J L SINGH के द्वारा
July 20, 2011

आदरणीय मधुरेश जी, मैं आपके लेख से इत्तेफाक रखते हुए आपका पूर्ण समर्थन करता हूँ. हमें दूसरों से उम्मीद रखने के बजाय खुद में यह अहसास जगान होगा की हम मिहनती हैं और तूफान से कश्ती को निकाल पायेंगें क्योंकि हम मिहनती है, प्रतिभाशाली हैं, और हम जातियों से ऊपर बिहारी हैं, भारतीय है. आपकी ज्ञान वर्धक पोस्ट मुझे काफी अच्छी और सत्य के करीब दिखती है.


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