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घूसखोर का जज्बा

Posted On: 5 Sep, 2011 Others,न्यूज़ बर्थ में

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मैं इधर घूसखोर के बारे में थोड़ा सकारात्मक हुआ हूं। बी पाजीटिव। उनके बारे में मेरी धारणा बदली है। मैं उनको आदमी से महान मानने लगा हूं।
मेरी राय में घूस लेने वाला आदमी यानी घूसखोर, घूस देने वाले आदमी से सभी अर्थों में बहुत अधिक महान है। सीनियर आइएएस एसएस वर्मा की संपत्ति जब्त हो रही है; लोकसेवा का अधिकार कानून लागू हो चुका है-यह सबकुछ जानते हुए घूसखोर नहीं मान रहा है। छह दिन में पांच घूसखोर पकड़े गये। यह घूस के प्रति उनका पैसन है; प्रतिबद्धता है; श्रद्धा है; समर्पण है; ईमानदारी है। आदमी में एकसाथ इतना गुण नहीं होता है। 
घूसखोर बड़े हिम्मत वाले होते हैं। घूस लेना हंसी-खेल नहीं है। अभी तो इसमें बहुत रिस्क है। बेचारा आदमी इतना रिस्क उठाने की हिम्मत नहीं करता है।
घूस लेने वाले आदमी के पास बड़ा दिमाग होता है। देखिये! ये सीओ साहब हैं। राजधानी पटना के ठीक बगल वाले ब्लाक में पोस्टेड हैं। जनाब का तरीका बेजोड़ है। नार्मल मसले को तत्काल विवाद में डाल देते हैं। एक नमूना :- जमीन के दाखिल- खारिज (म्यूटेशन) के मामलों में तब तक नोटिस करते रहते हैं, जब तक मुद्दे को बरगला देने वाला बखेड़ा खड़ा न हो जाये। स्वाभाविक तौर पर दोनों पक्ष के लोग उनके सामने हाथ बांधकर खड़े रहते हैं। नाप-तौल से रेट बढ़ता है। अपनी इस प्रक्रिया में सीओ साहब किसी की नहीं सुनते हैं। उनके पास सबको औकात में लाने की महारथ है। कापीराइट। उनके साथी- सहयोगी कई ऐसे लोग हैं, जिनकी चर्चा शासन के औचित्य को कठघरे में खड़ा करती है। उन्होंने अपने बूते कुछ प्राइवेट लोगों को सरकारी बना रखा है। वे बैठते तो हैं झीलनुमा कैंपस के टूटे कमरे में हैं, मगर …! मेरे एक परिचित बता रहे थे-इन्हीं जमात के अफसरों के चलते पटना में जमीन और फ्लैट का दाम बुलंदी पर पहुंच कर भी मेनटेन है।
मेरे सहयोगी लोग आजकल आफिस-आफिस घूम रहे हैं। दिलचस्प सीन है। भ्रष्टाचार के अनुभवों को खंगालना बड़ा रोमांच पैदा करता है- अएं ऐसा भी होता है? रोमांच की ताकत सिर्फ घूसखोर के पास है। आदमी के पास रोमांच पैदा करने की ताकत नहीं है।
घूसखोर अपने कर्तव्य के प्रति बड़े ईमानदार हैं। ये छुट्टियों के दिन भी आफिस पहुंच जाते हैं। आदमी ऐसा नहीं करता है। घूसखोर बड़ा फंड मैनेजर होता है। वृद्धावस्था पेंशन के रुपये से शेयर, फिर …, आदमी करोड़पति बनने के इतने तरीकों से वाकिफ नहीं है।
घूसखोर का अपनी कमाई से बड़ा लगाव होता है। वर्मा जी अपने ही घर को सरकार से किराये पर लेना चाहते थे। नहीं ले पाये। आदमी, लोक -लाज की सीमा में बंधा रहता है। घूसखोर, इस सीमा से बहुत दूर निकल जाता है। उन्मुक्त, बंधनमुक्त। घूसखोर, बच्चों की खिचड़ी के पैसे चुरा लेते हैं और कोढ़ मिटाने वाली दवा के भी। आदमी डरता है। उस दिन पटना कमिश्नर के दफ्तर में था। अधिकांश फरियादों में एक बात कामन सी थी-सर, बाबू काम नहीं कर रहा है। पैसा मांगता है। आदमी, आदमी से मान जाता है। घूसखोर, मशीन से भी नहीं मानता है।
एक घूसखोर ने अपनी पत्नी को घूस लेने को बोल दिया। बेचारी पकड़ी गयी। आदमी, ऐसा नहीं करता है। डाक से घूस भेजा जा रहा है। झारखंड के एक व्यक्ति ने केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल को डाक से एक लाख का चेक भेजा है। यह घूस नहीं, बल्कि घूसखोरी के प्रति आदमी का गुस्सा है।
सरयू प्रसाद आदमी है। बस्ती का किसान है। उसने अरविंद केजरीवाल के नाम नौ लाख का चेक दिया है। सरयू चाहता है कि केजरीवाल इस रुपये को आयकर विभाग को चुका कर जन-लोकपाल के मुद्दे पर सिविल सोसायटी की लड़ाई मजबूत करते रहें।
वाजिब सवाल है-आखिर यह देश किससे चल रहा है-सरयू प्रसाद से, वर्मा जी से या सीओ साहब से? मैंने पिछले हफ्ते भी एक सवाल उठाया था-क्या इस ग्रह (पृथ्वी) का आदमी, एलियन से दुरुस्त होगा? एलियन, दूसरे ग्रह के बाशिंदे हैं। अमेरिका इस पर शोध कर रहा है।

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Santosh Kumar के द्वारा
September 13, 2011

आदरणीय मधुरेश जी ,..सादर नमस्कार .बेहतरीन लेख ,…घूसखोरो की बढ़ती समस्याओं के मद्देनजर एक ट्रेनिंग स्कूल खोलना मुनाफे का सौदा हो सकता है ,… पूरी प्रतिभा दिखने के बाद भी कोई न कोई लपेटे में आ ही जाता है http://santo1979.jagranjunction.com/

suman dubey के द्वारा
September 6, 2011

मधुरेश जी नमस्कार्। बड़ा अछ्छा व्यंग है वास्तव में घूसखोर महान है और साह्स भरा काम हैं न जाने कितने वर्मा इस देश में भरे है ।

titu के द्वारा
September 6, 2011

Very Humorous article sir. I appreciate your different appraoch

shuklaom के द्वारा
September 5, 2011

मधुरेश जी आप लाजबाब लिखते है क्या तीखा प्रहार किया है. और बहुत वाजिब सवाल बहुत ही सही वक्त पर बहस के लिय हमारे बीच रखा है,एक प्रहसन के माध्यम से| धूमिल की कुछ पक्तिया उद्धृत करना चाहता हु जिसे उन्होंने ६९-७० में लिखी थी एक आदमी रोटी बेलता है, एक आदमी रोटी खाता है /एक आदमी ऐसा है भी जो /, सिर्फ रोटी से खेलता है /. मई पूछता हु /–यह तीसरा आदमी कौन है ? मेरे देश की संसद मौन है | आपने भी वर्मा साहब और सरजू प्रसाद या सी.ओ, साहब के बधाई हो ऐसा ही मनोरंजक प्रहार जारी रहे अगले पोस्ट की प्रतीक्चा रहेगी | वेंदे-मातरम :


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