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विजुअल, विजिबुल और विजिबिलिटी

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मुझे नजर (आंख) और विजिबिलिटी के बारे में नया ज्ञान हुआ है। आपसे शेयर करता हूं। असल में थोड़ा कन्फ्यूजन है। मुझे, आपकी मदद से इसके दूर होने की उम्मीद है। प्लीज, कोई मेरी मदद करेगा? मेरी राय में विजुअल, विजिबुल और विजिबिलिटी-कमोबेश एक ही तरह के शब्द हैं। सिचुएशन हैं। यह सब आंख और इससे देखने, दिखाने का मसला है। ये देखने- दिखाने के अलग-अलग स्टेज (चरण) हैं। हां, इसके लिए आंख जरूर चाहिए। अपने यहां आंख वाले अंधों की कमी है? मुख्यमंत्री जी (नीतीश कुमार) ने पुलिस से कहा है कि वह अपनी विजिबिलिटी बढ़ाए। वाकई, अपराधियों को इनविजिबुल (अदृश्य) करने के लिए पुलिस की विजिबिलिटी, यानी उसका दिखना बेहद जरूरी है। अभी पुलिस जरूरत के हिसाब से दिखती है? उम्मीद की जानी चाहिए कि अब वह खूब विजिबुल होगी, दिखेगी। मुझे माफ करेंगे। मैं थोड़ा भटक गया था। बात विजुअल, विजिबुल और विजिबिलिटी की हो रही थी। सिस्टम में इन शब्दों से जुड़े तरह-तरह के सिचुएशन हैं। कुछ को नजदीक देखने में दिक्कत होती है, तो कुछ को दूर का दिखाई नहीं देता है। मगर जिनकी आंखें कुछ देखे ही नहीं …! आपकी क्या राय है? मैं देख रहा हूं कि बहुत कुछ विजुअल है मगर कुछ लोगों के लिए यह विजिबुल नहीं है। यहां विजिबिलिटी की सूरत नहीं बनती है। आशियानानगर मोड़ पर टेंपो स्टैंड खुला हुआ है। पूरी तरह विजिबुल है। सबको दिख रहा है। लेकिन यह पुलिस के लिए विजिबुल नहीं है। यहां उसकी विजिबिलिटी नहीं है। एक और सिचुएशन है-कुछ के लिए जो विजिबुल है, वह दूसरों के लिए विजुअल नहीं है। सीतामढ़ी में सबकुछ विजुअल था। प्रताडि़त कंचनबाला के बारे में सब कोई सबकुछ जानता था। बस, पुलिस को नहीं दिखा। अब कंचन ने सुसाइड कर ली है। पुलिस की विजिबिलिटी दिख रही है। मैं, पब्लिक द्वारा सराय (वैशाली) थाना फूंकने के मामले में डीआईजी की जांच रिपोर्ट पढ़ रहा था। उन्होंने लिखा है-पुलिस पर हमला करने, थाना जलाने वालों में से कोई भी लोकल आदमी नहीं था। बाहर से लोग बुलाए गए थे। हंगामा के पहले वाली रात को भोज हुआ था। यानी, सबकुछ विजुअल था। यहां विजिबिलिटी क्यों नहीं दिखी? कौन जिम्मेदार है? अक्सर पब्लिक के लिए जो कुछ विजिबुल होता है, सिस्टम के लिए नहीं होता है। मेरी राय में पुलिस या सिस्टम के दूसरे तंत्रों की विजिबिलिटी के ढेर सारे स्पाट हैं। यह पूरी तरह विजुअल भी हैं। लेकिन खासकर पुलिस की जानमारू ड्यूटी, उसके काम का माहौल, जीवनदशा, टेंशन, बीमारी, पुराने हथियार …, यहां किसकी विजिबिलिटी होनी चाहिये? तो क्या यही सिस्टम है? बेहतर सिस्टम के लिए सिर्फ राजनीतिक कार्यपालिका या सत्ता शीर्ष जिम्मेदार है? इसमें एक अदने से आदमी की भी बाकायदा विजिबिलिटी होती है। अस्पताल में मरीज का सिचुएशन आडियो -विजुअल, दोनों है। लेकिन डाक्टर के लिए यह विजुअल नहीं है। उसकी विजिबिलिटी नहीं है। स्कूल को देखिए। वहां के मध्याह्न भोजन को देखिए। पब्लिक को सबकुछ विजुअल है। मगर अफसर को …! अच्छी बात है कि पुलिस अपनी आंखें फैला रही है। उसकी अपनी आंखों से उसका काम नहीं चल रहा है। वह सीसीटीवी और वीडियो कैमरों का सहारा ले रही है। पटना जंक्शन पर कैमरा लगाकर ट्रैफिक को दुरुस्त करने की बात हो रही है। हो जाएगा? घर के बेडरूम में कार समेत पहुंचने की मानसिकता के माहौल में ट्रैफिक ठीक हो जाएगा? अब तो आदमी को मशीन से पकड़ा जा रहा है। ट्रैक किया जा रहा है। आदमी के लिए इससे अधिक शर्मनाक और क्या होगा? लोकसेवक मान रहे हैं? राजनीति में देखने-दिखाने से जुड़े इन शब्दों के अपने मायने हैं। कुछ लोग चाहते हैं कि दूसरे, उनकी नजरों से देखें। कुछ लोग ऐसा करने की कोशिश करते हैं, फिर भी उनको कुछ नजर नहीं आता है। सामने वाला सीधे बोलता है-चश्मा बदलिए या फिर आंख का इलाज कराइए। हां, कुछ लोग जानबूझकर कुछ देखना नहीं चाहते हैं। कुछ लोगों को होता कुछ है, दिखता कुछ और है। नजरों से ताल्लुक रखने वाले ढेर सारे प्राब्लम हैं। चलिए, आंख के डाक्टरों का भविष्य बहुत बेहतर है।

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