blogid : 53 postid : 320

नेताओं की जुबान

  • SocialTwist Tell-a-Friend

मैं अभी तक यही जानता था कि जुबान फिसलने के लिए होती है, फिसल ही जाती है। यह आदमी के लिए नार्मल सिचुएशन है। मगर नेता की जुबान …! खुद देख लीजिए, सुन लीजिए। दिलचस्प सीन है। नेता प्रतिपक्ष अब्दुल बारी सिद्दीकी आत्महत्या के मूड में हैं। और जदयू, भाजपा के नेता उनको रोक रहे हैं। कौन कहता है कि दलीय राजनीति, बस दुश्मनी है? सिद्दीकी साहब सत्ताधारी जमात के जुबानबाजों की जुबान से परेशान होकर सुसाइड करना चाहते हैं। उनके अनुसार उनका प्राब्लम है कि उनकी जुबान की नोटिस मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नहीं लेते हैं, उन (सिद्दीकी साहब) पर जुबान नहीं चलाते हैं। बाकी पार्टियों की तुलना में जदयू और भाजपा के पास जुबान चलाने वाले ज्यादा लोग हैं। दुनिया में कहीं भी कुछ भी हो जाए, भाई लोग शुरू हो जाते हैं। सिद्दीकी साहब चाहते हैं जुबानबाजी में सीनियर-जूनियर का ख्याल रहे। जुबानी जंग बराबरी वालों के बीच हो। यही लोकतांत्रिक संस्कृति है। उनको कोई नहीं सुन रहा है। सभी बस बोल रहे हैं। जुबानबाज, सामने वालों को नैतिकता पढ़ाते हैं, चुप रहने की हिदायत देते हैं। सिद्दीकी साहब तबाह हैं-जो लोग मुझे नैतिकता का पाठ पढ़ा रहे हैं, उनका क्लास करने से बेहतर है कि आत्महत्या कर लूं। देखिए, जदयू के प्रदेश प्रवक्ता संजय सिंह उनको समझा रहे हैं-आपके मुंह से ये बातें शोभा नहीं देती हैं। आप बौखलाहट में हैं। सो, आत्महत्या की बात सोच रहे हैं। प्लीज, शांत रहें। हमको छोटा बता अपने अहंकार का परिचय न दें। मैं देख रहा हूं कि आजकल विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग कुछ ज्यादा हो रहा है। एक से बढ़कर एक विचार है, बातें हैं। बुजुर्ग समाजवादी भोला सिंह का नया ज्ञान सुनिए -लालू प्रसाद जब भी बिहार आते हैं, अपराध बढ़ जाता है। लालू गैंग लेकर आते हैं, जो उनके साथ लौट भी जाता है? मैं उस दिन डा.भीम सिंह को सुन रहा था। जनाब, दोनों दिन जोश में थे। पहले दिन जोश में जुबान चला दी- भाजपा, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करे, तभी देश में राजग की क्लीन स्वीप होगी। अब वे दूसरे दिन बोल रहे हैं -मैं जोश में बोल गया था। मेरे इस जुबान (बयान) की ऐसी की तैसी। यह मेरी व्यक्तिगत राय थी। इसमें कौन सी नई बात है? नेता हमेशा जोश में रहता है। मुझको तो लगता है कि अपने नेता बड़े फुर्सत में भी हैं। उस दिन उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी अपने सुशासन की असली कामयाबी सुना रहे थे-लालू प्रसाद भी अपने जमाने का कमाया हुआ पैसा निवेश कर रहे हैं। उनका बेटा बिहार का सबसे बढिय़ा शोरूम (मोटरसाइकिल का) खोला है। इसके जवाब में राजद के जुबानबाज शुरू हैं। उन्होंने मोदी जी की जो संपत्तियां गिनाई हैं, उनमें से कुछ के बारे में तो शायद मोदी जी को भी पता न होगा। यह नेताओं की पुरानी आदत है। उनको दूसरों के बारे में उनसे भी अधिक जानकारी होती है। कुछ नेता की जुबान हमेशा लपलपाती रहती है। वे बोलने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। कुछ भी पूछ लीजिए। कुछ के रेडीमेड जवाब को उनसे बिना पूछे भी इस्तेमाल करने की सुविधा होती है। खासकर राज ठाकरे जैसों की सनक-बौराहट, बजट पर प्रतिक्रिया या शोक संदेश के दौरान इस सुविधा का बखूबी उपयोग होता है। जुबानबाज नेताओं के साथ बड़ी सुविधा है। वे बड़ी सहूलियत से अपनी जुबान बदल लेते हैं। आफ दि रिकार्ड, आन दि रिकार्ड …, मैं आज तक नहीं समझ पाया कि नेता एकसाथ इन दोनों विरोधी चरित्र को आखिर जी कैसे लेता है? नेता सबकुछ बोलने, बताने के बाद लास्ट में बोल देता है-नाट टू बी कोटेड। जुबान फंसने पर जब उसके पास बचाव का कोई उपाय नहीं बचता है, तो वह बड़े आराम से बोल देता है कि मेरे तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश किया गया है। हालांकि इस क्रम में डा.भीम सिंह प्रकरण बड़े ईमानदार भाव में दिखा है। मैंने यह भी देखा है कि कांग्रेस जब अपने बोलने वालों से आजिज आ गई, तो उसने बोलने वालों के नाम तय कर दिए। फिर भी कुछ कांग्रेसियों की जुबान खूब चल रही है। बीच के दिनों में जदयू के जुबानबाजों के लिए दिन तय किए गए थे। अब सभी एकसाथ बोलते हैं। मैं देख रहा हूं कि नेताओं की देखादेखी अफसर भी खूब जुबान चला रहे हैं। हां, उनकी जुबान से हमेशा सुनहरी घोषणाएं ही निकलती हैं। माडल गुरुजी, ग्रेट ब्रिटेन की तर्ज पर सूबे में कम्यूनिटी कालेज, महादलित जमात के बच्चों के लिए स्मार्ट क्लास …, भगवान करे यह सबकुछ पूरा भी हो जाए। अपने अश्विनी कुमार चौबे (स्वास्थ्य मंत्री) जब बोलने लगते हैं, तब …! और अंत में … जरा पटना हाईकोर्ट के न्यायाधीश नवनीति प्रसाद सिंह को भी सुनिए-अफसर बेरोजगार युवकों का कितना शोषण कर सकते हैं, इसका अंदाज लगाना कठिन है। दो बेरोजगार युवकों की याचिकाओं की सुनवाई के दौरान तो यही लगा है। दोनों को 19 साल से सिर्फ गुमराह किया जा रहा है। दोनों कोर्ट आए। अफसरों ने मानों उनको कोर्ट जाने की सजा देने की ठान ली। (श्रीकांत सिंह एवं सुदर्शन राम की याचिका को निष्पादित करने के दौरान दी गई टिप्पणी)। नेताओं की जुबानी जंग में इसको सुनने की किसी को फुर्सत है?

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 3.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

2 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

S N SHARMA के द्वारा
September 12, 2012

पिगी साहब के नाम बिना लेख पूरा नही माना जा सकता

harendra rawat के द्वारा
September 6, 2012

बिलकुल फंटूस लेख भी. अच्छी खिंचाई की गयी है इन बरसाती मेंढकों की.


topic of the week



latest from jagran