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नेताओं का आडियाज : मछली व साइकिल कथा ...

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बेजोड़ सीन है। देखिए।
राजद के लोग पाटलिपुत्रा कालोनी में मछली मार रहे हैं। बंसी डालते फुदकती मछली पानी से बाहर आ जाती है। मुझे ये मछलियां महान भारत की महान जनता टाइप लग रहीं हैं, जो नेताओं को देखते उस पर भरोसा कर लेती हैं। जनता की माफिक मछलियां, नेताओं पर कुर्बान हैं।
यह सब एक बड़े अफसर के घर के सामने हो रहा है। इस घर में राज्य सरकार की एक मंत्री भी रहती हैं। मैडम, सर जी को फोन पर पूरा सीन- सिचुएशन बता रहीं हैं। सर जी इस बात से परेशान हैं कि आखिर उनको इतनी देर से क्यों पता चला कि उनके घर के सामने इतनी मछलियां हैं? साब जी नान भेज हैं।
मैंने पहली बार जाना कि नेता इतनी सफाई से मछली भी मार सकता है। बड़ी सुंदर और पुष्ट मछलियां हैं। देखने वाले ऐसे देख रहे हैं कि मौका मिले तो आन स्पाट फ्राइ कर दें। खैर, अब बहस इस बात पर हो रही है कि सही में वहां मछली थी या नेता लोग अपने साथ मछली लेकर गए थे? मछली को बंसी में फंसाकर पानी में डाल रहे थे और निकाल ले रहे थे? इस पर शोध जारी है। नतीजा आते ही आपको पेश करूंगा। यह जो भी हो मगर यह सबकुछ राजधानी की गंदगी और जलजमाव के खिलाफ प्रतीकात्मक विरोध का लाजवाब तरीका रहा। इसे खूब सुर्खियां मिलीं। जिम्मेदार हलकान हैं। 
मैंने भी मान लिया है कि नेताओं के पास बेजोड़ दिमाग होता है। इसमें हमेशा नए-नए आइडियाज आते रहते हैं। जरा, यह सीन देखिए। यह भारत बंद की सुबह है। कुछ भाजपाई बड़े परेशान हैं। नेताओं ने साइकिल की डिमांड की हुई है। वे साइकिल से डाकबंगला चौराहा जाना चाहते हैं। यह डिफरेंट टाइप आइडिया है, जो बंदी के दौरान क्लिक कर जाएगा। कार्यकर्ताओं के पास साइकिल नहीं है। नई साइकिल खरीदने का कोई मतलब नहीं है। दस-पंद्रह मिनट के लिए पांच-सात साइकिलें खरीदना बेवकूफी है। पुरानी साइकिल तलाशी जा रही है। साइकिल पर चढऩे वाली पब्लिक इसे देने को तैयार नहीं है। उसे नेता पर भरोसा नहीं है। उसे देश और नेता से ज्यादा अपनी साइकिल की चिंता है। वह पहले अपने साइकिल के रुपये रखवा लेता है। साइकिल देता है। नेता जी साइकिल पर चढ़ते हैं। आगे-आगे साइकिल पर नेता जी, पीछे पैदल-पैदल साइकिल वाला। डाकबंगला चौराहा पर नेता जी फोटो खिंचवाने के बाद खुद को गिरफ्तार करा लेते हैं। साइकिल वाला अपनी साइकिल लेकर घर आ जाता है। यहां भी शोध का सिचुएशन है। इसके दो एंगल हैं-साइकिल वाले ने नेताओं से कितने रुपये लिये? साइकिल सुरक्षित मिलने पर उसे नेताओं को कितने रुपये लौटाने पड़े?
अभी भारतीय जनता युवा मोर्चा के बैनर तले भाजपाई प्रधानमंत्री के खिलाफ एफआईआर कराने थानों में पहुंचे हुए थे। वे चाहते थे कि कोयला घोटाला के मामले में प्रधानमंत्री पर मुकदमा दर्ज हो। स्वाभाविक तौर पर पुलिस ने इनकार कर दिया। यह नया आइडिया क्लिक हो गया। भारत बंद के दौरान जदयू से ताल्लुक रखने वाले लोग एम्बुलेंस लेकर घूम रहे थे। तरह-तरह का आइडिया है।
आजकल राजद के लोग बड़े परेशान हैं। उनके सुप्रीमो ने उनको कहा हुआ है कि पुराने अखबार की वह तमाम कटिंग्स जुटाओ, जो बताए कि कैसे तब की मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने बिहार को विशेष का दर्जा देने का आग्रह प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से किया था और वाजपेयी जी कुछ बिहारी नेताओं के दबाव पर फौरन बदल गए थे। राजद सुप्रीमो के अनुसार यह सब तीन फरवरी 2002 को हुआ है। कांग्रेसी भी इस पीरिएड का अखबार तलाश रहे हैं। राजद की तरह वे भी इसका पोस्टर छपवाएंगे, जनता में बंटवाएंगे।
और अंत में …
एक पोस्टर कैमूर के डीएम लगवा रहे हैं। इसमें काम करने वाले और निकम्मे पांच-पांच डाक्टरों की तस्वीरें होंगी। डाक्टर पूछ रहे हैं-क्या हम हिस्ट्रीशीटर हैं? आप डाक्टरों की मदद करेंगे?

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