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बच्चे देख रहे हैं, सीख रहे हैं

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तेईस मासूमों की मौत पर बवाल है। होना ही चाहिए। यह कब तक चलेगा? मेरी राय में तभी तक न, जब तक कहीं और लाशें न दिख जाएं या कोई नया मसला न उभर जाए। जिस दिन ऐसा होगा, मेरी गारंटी है ये मासूम भुला दिए जाएंगे।
मैं गलत हूं? कोसी और उसका प्रलय क्षेत्र आज कितनों को याद है? नरसंहार वाले गांवों में अब कोई जाता है? इसी महीने देखिए, कैसे बारी-बारी से बगहा गोलीकांड, जमुई पुलिसिया कारनामा …, और अब तो बोधगया का मोर्चा भी लगभग भुलाया जा रहा है। ठंडा सा है। हमें यह भी याद है कि अपनी आजादी के बाद हमने अब तक वैसे कितने मसलों को पूरी तरह भुला दिया है, जो याद रखे जाते, तो वाकई अपने देश की सूरत बिल्कुल दूसरी होती? हमने अपनी सुविधा के हिसाब से अपनी यादाश्त बना ली है। यह सब हर स्तर पर है। घर के निहायत रूटीन काम से लेकर राजपाट चलाने जैसे बड़े मसले तक पर। बच्चों की मौत पर बवाल में वे सभी भी शामिल हैं, जो कमोबेश इसके जिम्मेदार रहे हैं। आज इनमें से किसी को भी अपनी यह जानलेवा जिम्मेदारी याद नहीं है। नेता, बस मौके और फायदे के अनुसार अपनी याद का इस्तेमाल करता है। इसके बाद सबकुछ भूल जाता है।
मैं देख रहा हूं-दरअसल हम सब बेहद औपचारिक हो गए हैं। हर चीज में औपचारिकता है। आंसू बहाने से लेकर विरोध तक की औपचारिकता है। कुछ लोग मोमबत्ती जलाकर अपनी औपचारिकता पूरा करते हैं। कुछ को यह श्रद्धांजलि सभा में नजर आती है। सत्ताधारी की औपचारिकता उसकी सुनहरी घोषणा से पूरी होती है।
बहरहाल, मेरी राय में मशरक कांड मिड डे मील खाने से तेईस नौनिहालों के मरने भर का मामला नहीं है। इससे व्यवस्था के सभी पक्ष उस घिनौने अंदाज में खुलेआम हैं, जो इस बात की मुनादी हैं कि कैसे इक्कीसवीं सदी में भी लगभग सबकुछ भगवान भरोसे है। विकास का मोर्चा, आदमी और आदमियत के फर्क का गवाह है। आदमी चांद के बाद मंगल पर चला गया लेकिन आदमियत तो रिवर्स गियर में है। सिस्टम का चरित्र तो खुले में है ही, राजनीति का असली रंग भी सामने है। लाश और धमाके, राजनीति को बड़ी ताकत देते हैं। यह स्थिति अक्सर अराजक तत्वों को संरक्षित करती है। जड़ पर चोट नहीं हो पाती है। मिड डे मील का यह कांड बस इसी मायने में पहला है कि इस बार मासूम मर गए या मार दिए गए। वरना, इससे जुड़ी ढेर सारी और तरह-तरह की गड़बड़ी तो हमेशा सामने रही है। इससे कभी नसीहत ली गई? ऐसे दूसरे भी ढेर सारे नमूने हैं कि सिस्टम पहले हादसों की तैयारी कराता है, इसका इंतजार करता है और सबकुछ हो जाने के बाद सबकुछ दुरुस्त करने का दावा करता है। मुझे इस बार भी यही सब दिख रहा है।
मशरक कांड के पहले दिन इस बात पर खूब बहस चली थी कि कोई मासूमों को कैसे मार सकता है? इसमें शामिल लोग उस मिजाज को शायद भूल गए थे कि इसी राज्य व देश में बच्चे गाजर-मूली की तरह काटे जा चुके हैं। मध्य बिहार का कोई भी नरसंहार प्रभावित गांव इसकी गवाही दे सकता है।
खैर, यह देखिए। हमने अपने देश को कितना सुंदर बना रखा है! अहा, कितना मनोरम दृश्य है। वे सब बच्चे अचानक सबको बेहद प्रिय हो गए हैं, जिनकी ओर देखना मुनासिब नहीं समझा जाता है। मैं देख रहा हूं सभी बच्चों को खूब पुचकार रहे हैं। उनके लिए सरकार से लडऩे को तैयार हैं। बच्चों के लिए पूरा सिस्टम समर्पित है। मेरा मन भाव-विभोर हो रहा है।
यह मनोरम दृश्य भी देखिए। स्कूल में भोजन पक रहा है। मैं एक शिक्षिका को सुन रहा हूं-हमलोगों का सारा ध्यान बच्चों के खाने पर है। अब हम पढ़ाई से ज्यादा उनके खाने पर ध्यान दे रहे हैं। यानी, अपने महान भारत में करीब बारह करोड़ बच्चे बस इस लालच में स्कूल आते हैं कि यहां कम से कम एक समय का खाना तो मिलेगा। हमने विद्यालय को भोजनालय बना दिया है। अहा, कितना सुंदर दृश्य है।
सेंटीमेंट बचा है जी-मैं, पत्नी की राय से आजकल सहमत होने लगा हूं। मशरक कांड के बाद सिस्टम या नेताओं की जुबान पर यह लाइन नहीं चढ़ी है कि जहर पर भूख भारी है। देखिए, बच्चे अभी भी खा रहे हैं। हम ऐसे तिकड़मी संदर्भों के आदी  हैं। सही में जहर पर भूख भारी रही है। यह शुरू से रही है। भूखा आदमी वैसे भी मर जाता है।
मैं देख रहा हूं-बच्चे बहुत कुछ देख हैं। बहुत कुछ सीख रहे हैं। बच्चे देख रहे हैं कि उनके स्कूल के सामने कैसे उनकी कब्र बनती है? बच्चे सीख रहे हैं कि बच्चों की मौत पर किस तरह की लाइन लेनी चाहिए? बच्चे देख रहे हैं कि कैसे उनकी लाशें इस देश के सिस्टम को सतर्क करने का मौका भर है? बच्चे सीख रहे हैं कि कैसे पब्लिक को सबकुछ समझाकर चुप करा देना चाहिए?
मैं समझता हूं-इधर, बच्चों को ढेर सारी नई जानकारी हुई है। उनके मां-बाप ने भी नए- नए शब्द जाने हैं। ये हैं-मिड डे मील, मोनोक्रोटोफास, आरगेनो फास्फोरस, हिल्कान, फोरेंसिक साइंस लेबोरेट्री, जीसीएमएस, डाटा बेस, सीएम, डीजीपी, एडीजी, नेता प्रतिपक्ष …, अपना भारत ऐसे ही ज्ञानियों की भूमि नहीं कहलाता है?

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pankajranjan के द्वारा
September 10, 2013

सच्ची और सुलझी हुई बातें लिखी है आपने, काश नीतिनिर्माता भी यह बात समझ कर अपने निहित स्वार्थ से ऊपर उठकर सोचते की क्या हम विदेशियों के इशारे पर अपने देश के नौनिहालों को सही रास्ते पर भेज रहे हैं

jlsingh के द्वारा
July 26, 2013

सादर प्रणाम! आपको और आपकी लेखनी को भी! … इस आलेख पर हमारे नेता सरसरी नजर भी दौरा लेते!


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