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एहसास ए अरबपति

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मैं आस्तिक हूं। महान भारत की महान जनता की तरह मुझे भी चमत्कार पर, खासकर अपने लिए चमत्कार का पूरा भरोसा है। मैं बचपन से चमत्कार के इंतजार में रहा हूं। यह अभी, इसी पच्चीस जुलाई को पूरा हुआ है। मैंने मान लिया है कि वाकई चमत्कार, चमत्कार होता है। चमत्कार का सिचुएशन बड़ा चमत्कारिक होता है। यह बड़ा लजीज होता है। इसको बिना जुगाली चुपचाप सीधे घोंट जाने का मन करता है। यह कुछ देर के लिए होता है मगर लीवर में हमेशा के लिए रख लेने का मन करता है। यह भी जाना हूं कि लोग चमत्कार को नमस्कार क्यों करते हैं? मैं भी चार दिन से अपने चमत्कार को बारम्बार प्रणाम कर रहा हूं।
मेरे लिए पच्चीस तारीख की रात चमत्कार की रात थी। मैं अकबका गया था। सीन ही ऐसा था। मेरा चमत्कार मेरी नींद के दौरान आया था। मैंने ढेर सारे हसीन सपने देखें हैं। यह चमत्कारिक था। बड़ी देर तक रोम-रोम रोमांचित रहा। सबकुछ पाजिटिव, सुवासित। खैर, अपना चमत्कार आपसे शेयर करता हूं- मैं बड़ा चेंज फील कर रहा हूं। घर के साथ सबकुछ बदला हुआ है। चारों तरफ खुशनुमा माहौल है। मुहल्ले के कचराघर से भी भीनी- भीनी खूशबू आ रही है। (जाना कि सपने में नाक भी काम करता है)। हां, तो मेरा नाम फोब्र्स (मैगजीन) के धनवानों की रैंकिंग में है। मीडिया मुझसे मुखातिब होने को परेशान है। फ्लैश चमक रहे हैं। मुझे मां-पिताजी के नाम पर खोले गए कालेज का उद्घाटन करने जाना है। थोड़ी देर बाद मैं उस खाए-पिए- अघाए जमात में शामिल हूं, जो गरीबी पर बात करने संयुक्त राष्ट्र संघ जा रहा है। मैं दिल्ली के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा पर बिजनेस और एग्जीक्यूटिव क्लास के सफर वाली बहस का हिस्सेदार हूं। लोग (मेरी पत्नी भी) बड़े करीने व अदब से मुझसे पेश आ रहे हैं। मैं अरबपति हो गया हूं। न्यूयार्क वाली मीटिंग में घर से आया फोन रिसिव कर रहा हूं। बेटा बता रहा है-इनकम टैक्स वाले पधारे हुए हैं। मैं उसको अपने चार्टर्ड एकाउंटेंट का नम्बर बता रहा हूं।
बेशक, यह सपना ही था। असल में मैं उस रात योजना आयोग का यह चमत्कार जानने- सुनने के बाद सोया था कि गांव में 27 रुपये 20 पैसा और शहर में 33 रुपया 30 पैसा रोज दिन कमाने वाला गरीब नहीं है। घर लौटने के दौरान मैंने इसी हिसाब से अपनी औकात नाप लिया। यह जागते हुए ही मुझे अरबपति बना चुका था। और सोया तो यह सपना आ गया।
मेरी राय में इसका एहसास एकाध दिन रहता। मेरा मन इसकी पूरी तैयारी भी कर चुका था। लेकिन दूसरे ही दिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने औकात में ला दिया। मैं उनको सुन रहा था -गरीबी रेखा का यह नया पैमाना गरीबों के साथ मजाक है। गरीबी, अंडरइस्टीमेट की गई है। कुछ कैलोरी या आय को गरीबी रेखा का मानक नहीं माना जा सकता है। बुनियादी जरूरतों के साथ सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार सभी को है। वे जैसे-जैसे पटना डिक्लारेशन 2008 पर बोलते गए, मेरा अरबपति अपनी असली औकात में आता चला गया। यह आम भारतीय की नियति है। आजादी से अब तक की। पहले उसको सुनहरा सपना दिखाया जाता है और फौरन उसको तोड़ दिया जाता है।
मैंने पहली बार यह भी जाना है कि हम उस लाजवाब देश में हैं, जिसके कर्णधार कमाल के अर्थशास्त्री हैं। भाई जी ने एक रुपये आमदनी बढ़ाई और पूरे 17 करोड़ गरीब कम कर दिए। मैं तो यह सोचकर आश्चर्य में हूं कि इस बेजोड़ फंडा को रखते हुए भी गरीबी को जीरो पर ले जाने में क्या दिक्कत है? अरे, दो-चार रुपये और बढ़ा दो न, खत्म हो जाएगी गरीबी-मेरे एक सहयोगी बहस को पिले थे। शायद उनका चमत्कार भी नींद में आया था। जनाब बहुत गुस्से में थे।
मैं देख रहा हूं-अब इस बात पर बहस चली हुई है कि आदमी का पेट कितना में भर सकता है? कोई एक रुपया बता रहा है, तो कुछ इसके लिए पांच और बारह रुपये को जरूरी कहते हैं। उस दिन मुख्यमंत्री कह रहे थे-रकाबगंज (दिल्ली) गुरुद्वारा में रोज लंगर चलता है। मुफ्त में भोजन मिलता है। तो क्या यह कहा जाएगा कि दिल्ली में मुफ्त में भोजन मिलता है? वाजिब बात है।
बहरहाल, मैंने यह भी मान लिया है कि अपने देश में तरह-तरह के लीवर हैं। इसके लोड लेने की कैपेसिटी है। आदमी के अनुसार उसके लीवर की क्षमता होती है। कोई बड़े आराम से रोड, बांध, पुल पचा जाता है, डकार तक नहीं लेता है तो कुछ का लीवर खिचड़ी खाने में ही टें बोल जाता है। नेता और अफसर का लीवर, एक-दूसरे से बहुत मेल खाता है। उसकी किडनी, लीवर को पूरा सपोर्ट देती है। इसका भरपूर व सकारात्मक असर हार्ट पर पड़ता है। नेता, अफसर स्वस्थ है तो देश तंदरूस्त है।
अपने देश में गरीबी बड़ी लजीज है। इसमें दूसरों को अमीर बनाने की क्षमता है। यह प्रवचन का मुद्दा है। इस पर रिकार्ड शोध हैं। यह नारों का किरदार है। हम अभी तक यह तय नहीं कर पाए हैं कि आखिर गरीब कौन है? योजना आयोग अपने बाथरूम को दुरुस्त करने में 35 लाख खर्च करता है और बोलता है कि 27 रुपया कमाने वाला गरीब नहीं है। वाह, हम एक देश (भारत) में कितने देश बना रहे हैं?

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