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लाश पर नाच

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मुझे चार-पांच दिन से बहुत कुछ, बड़ा अजीब लग रहा है। यह सबकुछ बहुत डरावना है। आपसे शेयर करता हूं।

मैं देख रहा हूं कि माओवादियों ने पिसाय (औरंगाबाद) कांड की जिम्मेदारी ले ली है। वे कह रहे हैं कि पिसाय के सात लोगों को हमने मारा है। मारा क्या, बारूदी सुरंग विस्फोट में उड़ा दिया। मारे गए लोगों के बिखरे अंगों को जहां-तहां से उठाकर, जोड़कर सात की गिनती किसी तरह पूरी हुई है।

मैं, भाकपा माओवादी के मगध जोनल कमेटी के प्रवक्ता नटवर को पढ़-सुन रहा हूं। जनाब ने इस हमले में शामिल तमाम लोगों का क्रांतिकारी अभिनंदन किया है। वे कह रहे हैं कि मारे गए सुशील कुमार पांडेय रणवीर सेना के कमांडर थे। लक्ष्मणपुर बाथे, मियांपुर नरसंहार जैसी कई बड़ी वारदातों में उनकी हिस्सेदारी थी। उनका मारा जाना बेहद जरूरी था। माओवादी खूब खुश हैं। शुक्र है कि वे सात लोगों को मारने के बाद नाचे नहीं हैं। वे ऐसा करते हैं। पहले लाश गिराते हैं और फिर उस पर नाचते हैं। यह खुशी दिखाने का उनका अपना अंदाज है। हद है।

मुझे लग रहा है कि आगे कामरेड के ये तर्क आएंगे-लक्ष्मणपुर बाथे के तमाम आरोपी चूंकि पटना हाईकोर्ट से बरी हो गए, इसलिए हमने सजा दी है। नेताओं की तरह कामरेड के पास भी शब्द और तर्क की कमी नहीं रहती है। कामरेड बताएंगे कि सुशील पांडेय के साथ मारे गए छह लोग भी रणवीर सेना के थे?

मेरी राय में ऐसे ढेर सारे सवाल हैं। इन पर बड़ी लम्बी चर्चा हो सकती है। यह थोड़ी बाद में। अभी कुछ और सीन देख लीजिए।

मैं, गिरिराज सिंह को सुन रहा हूं। सर जी, सुशील पांडेय को दूसरा बरमेश्वर मुखिया बता रहे हैं। बरमेश्वर मुखिया, यानी मौत का काफिला कहलाने वाली रणवीर सेना के सुप्रीमो। मुखिया जी इस दुनिया में नहीं हैं। मार दिए गए। आखिर गिरिराज सिंह ऐसा क्यों कह रहे हैं? वे क्या चाहते हैं? लोगों को क्या संदेश दे रहे हैं?

मैं यह भी देख रहा हूं कि मुखिया जी के उत्तराधिकारी (पुत्र) इंदुभूषण सिंह बदला लेने की बात कह रहे हैं। मैं उनके पीछे चल रहे युवकों को सुन रहा हूं-खून का बदला खून से लेंगे; एक का बदला सौ से लेंगे; मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मुर्दाबाद; यह सरकार निकम्मी है, यह सरकार बदलनी है। पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी गांव में हम हैं ना का भरोसा दे रहे हैं, तो रामाधार सिंह (पूर्व मंत्री) बोल रहे हैं-कुछ लोग लाश पर राजनीति कर रहे हैं। पांच लाख रुपया मुआवजा गिनकर ताली पीट रहे हैं। जदयू के प्रदेश प्रवक्ता नीरज कुमार कह रहे हैं-यह सामाजिक सद्भाव बिगाडऩे की साजिश है। गांवों में अशांति फैलाने की कोशिश हो रही है। सामाजिक सौहार्द हमारी पूंजी है। हम इसे खोने नहीं देंगे।

मैं, मौके पर पब्लिक टाइप कुछ लोगों को सुन रहा हूं। आप भी सुनिए-हमलोग बहुत चुप रहे, सरकार हमारी चुप्पी का फायदा उठा रही है। एक कह रहा है-मगध प्रमंडल का शेर मारा गया। अब कौन समाज की अगुआई करेगा? दूसरा-शांति हमने लाई थी, अब क्रांति लाएंगे। तीसरा-सरकार चाहती है कि एक जाति विशेष के लोग बिहार छोड़कर भाग जाएं। हमारा समाज करारा जवाब देगा। चौथा- हम मां का दूध पीए हैं, सीना में गोली खाएंगे। पांचवां-धरती वीरों से खाली नहीं है। दूसरा शेर भी पैदा होगा।

मैं, जहां तक समझ पाया हूं-एक (पक्ष) बदला ले चुका है, दूसरा (पक्ष) बदला लेने की तैयारी में है। मैं यह समझ नहीं पा रहा हूं कि क्या बिहार फिर उसी अंधेरी सुरंग में समा जाएगा, जहां से बड़ी मुश्किल से निकला है? ऐसा न हो, इसके लिए कितने लोग अपनी भूमिका ईमानदारी से निभा रहे हैं?

मुझे कुछ और बातें समझ में नहीं आ रहीं हैं। आखिर यह दोनों पक्ष अपना समर्थक कैसे तय कर लेता है? इसका आधार क्या है? उनको इसका  अधिकार कैसे मिल जाता है? ये पक्ष अपने समर्थकों के लिए कुछ करते भी हैं? लक्ष्मणपुर बाथे, मियांपुर …, लाशें गिरने के बाद कामरेड कितनी दफा वहां गए? एक संगठन का हालिया बाथे मार्च बस प्रतीकात्मक या सजावटी नहीं है? लक्ष्मणपुर बाथे में मारे गए लोगों को अपना बताने वाला कोई भी संगठन पटना हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जा रहा है? सेनारी कोई जाता है? रणवीर सेना ने सेनारी की सुरक्षा के लिए क्या किया था? उसी के अनुसार यह उसकी जिम्मेदारी नहीं थी? लई-मतगढ़ा के विधवा-अनाथों की कोई सुधि लेने वाला है? क्यों नहीं है?

फिर यह क्या तरीका हुआ कि अपनी सहूलियत से काटने के लिए कमजोर गर्दन तलाश लो और उसे काट डालो? यह कोई वाद है या …, आप कुछ बता पाएंगे? मेरे मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि जब दोनों पक्ष अपनों के इतने हिमायती हैं, तो आपस में एक ही बार क्यों नहीं फरिया (निबट) लेते हैं? कभी नक्सली संगठन और निजी सेना आमने-सामने टकराई है? नहीं न! तो क्या दोनों पक्षों को साफ्ट टारगेट वाली गर्दनों के बूते बस लाशों का संतुलन करने आता है? यह लाशों की सौदागरी नहीं है? इस जमीन पर नेता को तो मजा आएगा ही। वह मजा मार रहा है। मारेगा।

मैंने, पिसाय की एक और लाइन सुनी है। एक अधेड़ मायूस भाव में बोल रहा था-अब तो लेवी देनी ही पड़ेगी। जितना माओवादी मांगेंगे, देनी पड़ेगी। यहां माओवादियों से सुरक्षा का संकट है। यही वह संकट है, जो नक्सलियों के विरोध की तर्क पर निजी सेनाओं का गठन कराता है, जो अंतत: कानून -व्यवस्था का बड़ा संकट साबित होती है। और यही स्थिति उक्त तमाम स्थितियों के मूल में है। यह शासन की तगड़ी चुनौती है। हालांकि इसके शमन में सबकी जिम्मेदारी है। यह अकेले सरकार के बूते की बात नहीं है।

मैं देख रहा हूं कि पिसाय कांड पर राजनीति शुरू हो गई है। ऐसे मौकों पर कानून- व्यवस्था की आलोचना, विरोध-प्रदर्शन …, सबकुछ स्वाभाविक है। लेकिन यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि आरोप-प्रत्यारोप में अराजक तत्व हमेशा संरक्षित रह जाते हैं। कोई सुन भी रहा है?

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