blogid : 53 postid : 659824

उफ यह आदमी ..., रोक सको तो रोक लो

  • SocialTwist Tell-a-Friend

अब मैंने भी मान लिया है कि अपना देश (खासकर बिहार) वीर जवानों का है। ढेर सारे वीर हैं। तरह-तरह के वीर हैं। बूढ़े भी वीर कहलाने के लिए जब-तब जवान बन जाते हैं। आप भी वीरों की जवानी देखिए।

उस दिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सुन रहा था। वे हॉर्न बेस्ड ड्राइविंग पर बोल रहे थे- चारों तरफ पींऽऽ-पींऽऽऽ, पोंऽऽ-पोंऽऽऽ। अरे, क्या मतलब है? क्यों हॉर्न बजा रहे हैं? क्या हो जाएगा? कोई, कैसे साइड देगा? आगे भी तो गाडिय़ां हैं? क्या हड़बड़ी है? किसको पीछे करना चाहते हैं? किसको हटाना चाहते हैं? क्यों? एम्बुलेंस का हॉर्न बजे तो बात समझ में आती है? टेम्पो वाला भी बजाता रहता है। हद है। मेरी राय में यह सड़क पर गाड़ी में बैठकर दिखाई जाने वाली वीरता है। इनको कौन, क्या खाकर रोक सकता है?

मैं, मुख्यमंत्री के कुछ संस्मरणों को सुन रहा था। वे बता रहे थे कि इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान के एक समारोह में लाउडस्पीकर लगा दिया गया था। उन्होंने हटवाया। इंदिरा गांधी हृदय रोग संस्थान के कैंपस में बाजा बज रहा था। मेरे काफिले में भी जब-तब हूटर (सायरन) बजा दिया जाता है। मैं बंद कराता हूं। … ब्रश करने के दौरान लोग नल खोल देते हैं। ढेर सारा पानी बर्बाद हो जाता है। मुख्यमंत्री, दरअसल सरकार या कानून की सीमा समझा रहे थे। वे बता रहे थे कि इसके बूते आदमी, उसकी मूर्खता या जानबूझकर की जा रहीं गलतियों को कैसे रोका जा सकता है? यह तो पूरी तरह आदमी पर निर्भर है। वाकई, ऐसे वीर, किसके रोके रूकेंगे? ये वीर तो अपनी सिर की सुरक्षा तक के लिए पुलिसिया डंडे पर निर्भर हैं। हेलमेट चेकिंग बंद हो जाए, इन वीरों की तादाद सामने होगी।

कुछ और वीरों को देखिए। वित्त वाणिज्यकर आयुक्त एनके सिन्हा कह रहे हैं-यहां ढाई लाख डीलर हैं। लेकिन टैक्स सिर्फ साठ हजार देते हैं। दो लाख करोड़ का सालाना कारोबार है। 22 हजार करोड़ टैक्स आना चाहिए। नहीं आता है। क्यों नहीं आता है? कौन जिम्मेदार है?

मैं समझता हूं हड़ताल, अपने वीरों का ब्रह्मास्त्र है। टेम्पो या बस वाले को ओवरलोडिंग से रोकिए, तो हड़ताल कर देते हैं। कर्मचारियों की हड़ताल, डाक्टरों की हड़ताल, शिक्षकों की हड़ताल, वकीलों की हड़ताल …, और कमोबेश हर बार सरकार ही हारती है। हड़ताल, वीरता का उन्माद है; चरम है। हां, हम इस बात पर मजे की बहस कर सकते हैं कि हड़ताल आखिर होती क्यों है?

दीवाली कुछ दिन पहले गुजरी है। मैंने देखा कि कुछ लोग रात दस बजे के बाद ही पटाखा फोडऩे बैठे। दस बजे तक ही पटाखा फोडऩे की अनुमति थी। अपने किस्म की वीरता है। जरा इसे भी देखिए। राजधानी के नर्सिंग होम में पड़ी निशा, एक नई वीरता की गवाही है। यह बिहारी समाज की भयावह सोच है। यह रसगुल्ला खिलाकर गोली खिलाने की सोच है। न्यू यारपुर (पटना) क्षेत्र की इस लड़की की गलती बस यही थी कि वह मुहल्ले में आई बरात को देखने के लिए अपनी बालकनी में आ गई थी। बरात में आए वीर अंधाधुंध फायरिंग कर रहे थे। एक गोली निशा को लग गई।

एक वीरता टेम्पो में लटकने की है। टेम्पो का ड्राइवर अपने अलावा अपनी सीट पर और तीन-चार लोगों को बिठा लेता है। ऐसा तब है, जबकि बगल से खाली टेम्पो गुजरता रहता है। वीरता की एक किस्म गंगा पूजन के दौरान दिखती है। पहले आदमी को गंगा मैया को प्रणाम करता है, फिर उसमें कचरा फेंकता है और फिर प्रणाम करता है।

मैं, उस दिन गांधी मैदान से गंगा किनारे वाली सड़क से दानापुर जा रहा था। राजापुर पुल के बाद से इसका  फुटपाथ देख मायूस हुआ। फुटपाथ पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर कचरा रखा जाता है। दीवार पर गोइठा थोपा हुआ है। जहां साफ है, वहां मछली-मुर्गा बिकता है। कोई माई का लाल रोककर दिखाए? असल में एक वीरता अपने घर के कूड़े को बाहर कर घर को साफ मान लेने की है। मुहल्ले के खाली प्लाट कचरा घर बने हैं। जिन वीरों ने ऐसा किया है, वे सभी इसे झेल भी रहे हैं। शाम में वीरों के किसी भी मुहल्ले में निकल जाएं, उनके घरों की खिड़कियां बंद मिलेंगी। मच्छर मारने की दवा या उपायों की बिक्री पर शोध हो, तो मेरी गारंटी है कि पटना पहले नम्बर पर होगा।

यह भी वीरता है। देखिए। मेरे एक परिचित एजी कालोनी के बारे में बता रहे थे। यहां साठ फीट चौड़ी सड़क के लिए जमीन थी। एक बड़े अफसर ने इसकी बीस-बाइस फीट जमीन अपने कैंपस में मिला ली। मुहल्ले के बाकी लोगों ने भी यही किया। अब यहां सड़क के नाम पर बमुश्किल दस-बारह फीट चौड़ी गली है। कोई रोकेगा? क्यों रोकेगा? डा.बी.भट्टाचार्याकी घर से थोड़ा आगे पटेल नगर के किसी मुहल्ले में चले जाइये। इन मुहल्लों की सड़क पर दो गाडिय़ां आमने- सामने से नहीं निकल सकतीं हैं। बड़े-बड़े मकान हैं। सबकी बड़ी-बड़ी गाडिय़ां हैं। ये वीर सरकार को खूब कोसते हैं। यह सरकार को कोसने की वीरता है।

एक वीरता खतरों का खिलाड़ी टाइप है। वीर आदमी यह जानते हुए भी कि दस-बारह फीट की सड़क पर बनी बहुमंजिली इमारत में नहीं रहना चाहिए, भूमि पूजन के दिन अपना फ्लैट बुक करवा लेता है। अगर कोई हादसा हो जाए तो …? मैंने कई वीरों को ऐसे मौकों पर कांपते हुए देखा है।

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

2 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shailesh001 के द्वारा
December 3, 2013

बड़े महान वीर हैं ये, इनको तो महावीर चहिएं इनकी वीरता की असली परख के लिए … आपका साधुवाद.

jlsingh के द्वारा
December 2, 2013

उत्तम वीर गाथा!


topic of the week



latest from jagran