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गिरिराज लीला

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मैं अभी तक यही जानता था कि  लीला, भगवान रचते हैं। करते भी वही हैं। लीला का पूरा मसला पूरी तरह भगवान के लिए सर्वाधिकार सुरक्षित टाइप का है।

अब लीला के बारे में नया ज्ञान हुआ है। यह इस प्रकार है। अपनी धरती पर, यानी इस नश्वर जगत में लीला पर अपने नेताओं की कॉपीराइट है। वही इसके रचयिता हैं। प्रतिपालक हैं। नेता, मौका और सुविधा के हिसाब से लीला रचते हैं। करते हैं। तरह- तरह की लीला है। पब्लिक, लीला को चुपचाप देखती है। झेलती है। नेता की लीला, पब्लिक को नचा देती है। नेताओं ने पब्लिक के जिम्मे इतना ही भर छोड़ा हुआ है। बहरहाल, यह सबसे लेटेस्ट लीला है-गिरिराज लीला। बेजोड़ है। देखिए। मेरे साथ ज्ञानवद्र्धन कीजिए।

यह लीला चूंकि गिरिराज सिंह द्वारा रचित है, इसलिए इसका नाम गिरिराज लीला है। गिरिराज, इस पर पेटेंट का दावा कर सकते हैं। हालांकि ऐसी लीला कई नेता बखूबी अंजाम देते रहे हैं। प्रभुनाथ सिंह, अकबरुद्दीन ओबैसी, आजम खां, अमित शाह, प्रवीण तोगडिय़ा से लेकर बाबा रामदेव …, इस बात पर मजे का शोध हो सकता है कि किसकी लीला, किस पर भारी है; किसने, किसके लिए कौन सी लीला रची है? अभी गिरिराज लीला सब पर भारी है। मैं समझता हूं कि ढेर सारे लोगों को गिरिराज सिंह से ईष्र्या हो रही है।

गिरिराज, भाजपा के वरीय नेता हैं। मंत्री थे। विधान पार्षद रहे। अबकी सांसद बनने को ट्राई मारे हैं। मैं समझता हूं, अभी का जो सीन है और उनकी लीला जिस रास्ते बढ़ी हुई है, चुनाव जीतने के बाद बहुत कुछ बनने की गुंजाइश है। खैर, उनकी लीला जानिए। अपने महान भारत का बहुत कुछ अपने-आप स्पष्ट हो जाएगा।

गिरिराज सिंह को अपनी लीला के लिए कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ी है। वे बोलने के महारथी हैं। बस महारथ दिखा दी। कह दिया कि नरेंद्र मोदी का विरोध करने वाले पाकिस्तानपरस्त हैं। ऐसे लोगों को पाकिस्तान चला जाना चाहिए। हां, तो गिरिराज लीला का सीन आगे बढ़ रहा है। बवाल मच गया है। तीन मुकदमे हुए हैं। बोकारो के एसडीजेएम ने वारंट जारी किया है। झारखंड की पुलिस दो-दो बार गिरिराज को पकडऩे आई है। चली गई है। सिंह जी लापता हैं। उनका मोबाइल स्विच ऑफ है। पटना में हुए मुकदमा को लेकर पटना जिला जज ने उनको राहत दी है। देवघर की अदालत ने तीन मई तक उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। बोकारो की अदालत ने याचिका खारिज कर दी। जनाब मीडिया में छाए हुए हैं। पाकिस्तान का भी कमेंट आ गया। फारूख अब्दुल्ला कश्मीर में उनकी चर्चा कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी पहले ही बोल चुके हैं। गिरिराज जी, लोगों की जुबान पर हैं। नेताओं का एजेंडा हैं। सरेंडर करने की बात कही है। सब इंतजार में हैं। कहां हैं, कोई नहीं बता पा रहा है। हां, उनसे उनकी पार्टी के नेताओं की बात जरूर हो रही है। भाजपा के बिहार प्रभारी धमेंद्र प्रधान कह रहे हैं-गिरिराज कानूनी प्रक्रिया पूरी कर रहे हैं। मीडिया के लिए ब्रेकिंग/एक्सक्लुसिव न्यूज हैं। मैं नहीं जानता कि यह सब कब तक चलेगा? मैं समझता हूं तब तक शायद चुनाव का एकाध और चरण गुजर जाएगा। उनकी सुर्खी कायम रहेगी।

मेरे एक सहयोगी ने मुझसे पूछा-आखिर इस मामले में गिरिराज सिंह को क्या हो जाएगा? क्या यह ऐसा कुछ होगा, जो मुफ्त की इतनी सुर्खियों की तुलना में ज्यादा कहलाएगा? बेशक, यहां राजनीति में बदजुबानी का अपना रिकॉर्ड है। आचारसंहिता उल्लंघन के मामले हजार को पार कर गए हैं। कानून से खेलना, उसे तोडऩा अपने नेताओं की पुरानी लीला है। ऐसी लीला रचने वाले बाकी नेताओं को क्या हो गया, जो गिरिराज को होगा? अरे, सबकुछ तो प्रतीकात्मक या सजावटी ही है अपने देश में। फिर, कुछ अजीब बोलकर आखिर कोई क्यों रातोंरात चर्चित नहीं होना चाहेगा? मीडिया हाइप, भुनाया भी तो जाना चाहिए।

यह सीन भी देखिए। शुरू में भाजपा ने गिरिराज के बयान से पल्ला झाड़ लिया है। अब कुछ भाजपाई, गिरिराज की तरफदारी में बोलने लगे हैं। कुछ कह रहे हैं कि आखिर लालू प्रसाद, शकुनी चौधरी आदि पर चुनाव आयोग कार्रवाई क्यों नहीं कर रहा है, जबकि वे गिरिराज सिंह से भी ज्यादा आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं? लालू प्रसाद ने नरेंद्र मोदी को पापी और कसाइयों का कसाई कहा है। अश्विनी कुमार चौबे कह रहे हैं कि चुनाव आयोग यूपीए सरकार के इशारे पर काम कर रहा है। यह कमोबेश वही बात है, जैसे आजम खां ने चुनाव आयोग पर मुकदमा करने को कहा था। जदयू, लगातार सवाल पूछ रहा है-भाजपा, वाकई गिरिराज की गलती मान रही है, तो उनको पार्टी से क्यों नहीं निकाल रही है?

अपने नेताओं ने तो जेल से जुड़ा लोकलाज भी धो डाला है। अपने एक बिहारी नेता जेल से हाथी पर बैठकर घर लौटे थे। लीला, इसकी दास्तान बड़ा लम्बी है। तो वास्तव में नेता, समाज का पथ प्रदर्शक होता है? जनता के पाले से उभरा यह सवाल गलत है? कोई बताएगा? नेता, चुप क्यों हैं? वे यह भी बता दें कि बदली परिस्थिति में उनको क्या कहा जाए?

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
May 1, 2014

अपने नेताओं ने तो जेल से जुड़ा लोकलाज भी धो डाला है। अपने एक बिहारी नेता जेल से हाथी पर बैठकर घर लौटे थे। लीला, इसकी दास्तान बड़ा लम्बी है। तो वास्तव में नेता, समाज का पथ प्रदर्शक होता है? जनता के पाले से उभरा यह सवाल गलत है? कोई बताएगा? नेता, चुप क्यों हैं? वे यह भी बता दें कि बदली परिस्थिति में उनको क्या कहा जाए? -लीलाधर


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